अंधेरा पसंद है मुझे
कोई भेद-भाव नहीं करता
ये तो उजाला है
जो फरक बताता है
अच्छा है, शाम ढलते ही..
अंधेरा छा जाता है
इंसान,
कुछ समय के लिए
मुर्दा बन जाता है
वैसे भी जिंदा, कौन है यह
चीखे है, जो सुनायी नहीं देती
बेबसी है, जो दिखाई नहीं देती
सड़क पर बच्ची, भूक से बिलबिलाती है
बलातकार पीड़िता भी यहा,
इंसाफ के लिए चिलाती है
बहरे है यहा......
या कोई जिंदा ही नहीं
शरीर है...
पर शायद आत्मा ही नहीं
काला चश्मा पहन, अँधेरा किया है
ताकि सच, दिखाई ना दे
महंगे ईयरफोन भी खरीदे है
ताकि सच, सुनाई ना दे
तेज़ गाड़ी भी खरीदी है
पीछा छुटाने को
रोज मुखौटा भी लगाया है
खुद को जिंदा दिखाने को
जवानी को गिरवी रख
कबर ख़रीदी है, 2 बेडरूम साइज़ कि
सपने को छोड़, सुन्ते है ख़्वाइश कि
ख्ख़्वाइशो के तले, सपनों को दफ़नाते हैं
पर ये सपने ही हैं
जो हमें जिंदा दीखाते है
मिट्टी नहीं है ऊपर
पर दफन है, चार दिवारी मै
आवाज नहीं उठाते
खामोश है, ना जाने किस लाचारी मै
अच्छा है
शोरगुल है चारो तराफ
चीखे सुनायी नहीं देति
अच्छा है
अँधेरा है
ये जो जिंदा लाशे है, दीखायी नहीं देती
✍️ “अंधेरा मुझे कभी डराता नहीं, क्योंकि वहीं सच्चाई छुपी होती है। रोशनी में सब चेहरे नक़ाब ओढ़ लेते हैं पर अंधेरा, वो ईमानदार है... जो जैसा है, वैसा दिखाता है।”