बारिश के बाद पत्तियाँ कैसे खिल उठती हैं,
उनका रंग कैसे निखर कर सामने आता है।
जो कालिख पुती थी,
शहर की सजो-ओ-हवा में,
साफ़ हो गई है
और आज पेड़
खुल कर साँस लेगा।
✍️ “कभी-कभी हमें भी एक बारिश की ज़रूरत होती है जो शब्द नहीं कहती, बस मन की धूल धो देती है। और फिर भीतर कहीं… ज़िंदगी फिर से साँस लेने लगती है।”