ज़िंदगी अक्सर
शोर बनकर आती है,
और फिर
धीरे-धीरे रुलाती है।
हम चीखते हैं,
चिल्लाते हैं,
फिर वही आँसू पोंछकर
हमें चुप भी कराती है।
कुछ आवारगी,
कुछ बेचैनी साथ रहती है,
फिर वही बेचैनी
ख़ामोशी बन जाती है।
और चेहरे की मुस्कान
न जाने क्या छुपाती है
जब पूछता हूँ मैं,
आँखें कुछ और
और ज़ुबान कुछ और
कह जाती है।
✍️ “ज़िंदगी कभी सीधे जवाब नहीं देती। कभी शोर में उलझाती है, कभी ख़ामोशी में समझाती है। सच अक्सर वहीं मिलता है जहाँ शब्द नहीं पहुँचते।”